कभी खुद से मिलना हो तो कहना: अपनी खामोशियों को समझने का सफर

 

" पानी में दिख रहा मनुष्य का प्रतिबिंब, आत्म-चिंतन और अकेलेपन को दर्शाती गहरे भावों वाली हिंदी कविता"
कभी खुद से मिलना हो तो कहना:
अपनी खामोशियों को समझने का सफ

मेरी नज़र से,

क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपके भीतर शब्दों का सैलाब हो, लेकिन बाहर पूरी तरह सन्नाटा? हम अक्सर अपनी दुनिया में इतने सिमट जाते हैं कि अपनी ही खामोशियों के कैदी बन जाते हैं। मैंने हमेशा से जो महसूस किया, उसे अपने भीतर ही सहेजा। अपनों से साझा करने की कोशिश की, पर अक्सर अनुभव यही रहा कि लोग सुनने का नाटक तो करते हैं, लेकिन असल में कोई समझ नहीं पाता।


​यह ब्लॉग उन सभी के लिए है जो अकेलापन महसूस करते हैं, जो खुद को खोजने की तलाश में हैं और जो अंदर से बहुत कुछ हैं, पर बाहर से शांत हैं। यदि आप भी अपनी भावनाओं को बयां नहीं कर पाते, तो यह कविता आपकी ही कहानी है


तुमको तुम ही से मिलाएँगे


कभी ख़ुद से मिलना हो तो कहना,

तुमको तुम ही से मिलाएँगे।

घबराना मत, तुम्हारी कमियाँ नहीं गिनाएँगे,

औरों ने क्या देखा तुममें,

ये भी नहीं बताएँगे।

जो कर सको यक़ीन, तो कहना,

तुमको तुम ही से मिलाएँगे।

जो औरों ने ना देखा,

उस नज़र का दीदार कराएँगे।

जो बिखर चुका है तुममें,

वो बिखराव भी बताएँगे।

कह ना सके जो अब तक

किसी से...

वो बात भी सुनाएँगे।

कभी ख़ुद से मिलना हो तो कहना,

तुमको तुम ही से मिलाएँगे।

— पृथ्वी 🦂


आत्म-चिंतन: क्या आप खुद से मिल पाए?

यह कविता केवल शब्द नहीं, बल्कि उन लोगों से किया गया एक वादा है जिन्हें लगता है कि उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। इसमें मैंने उनको उन्हीं से मिलाने की कोशिश की है—बिना किसी भेदभाव के और बिना किसी निर्णय (judgment) के।

हम अक्सर दूसरों की नज़रों से खुद को देखते हैं। लेकिन क्या होगा अगर हम उन नज़रों को छोड़कर, अपनी कमियों को भी अपनी पहचान का हिस्सा मान लें? जो बिखर चुका है, वही अक्सर हमें पूरा करता है। यह ब्लॉग उसी आत्म-स्वीकृति (self-acceptance) की एक छोटी सी कोशिश है।


आपकी भागीदारी का इंतज़ार है

अगर आपको यह पंक्तियाँ छू गईं, अगर आपको लगा कि यह आपकी ही अनकही दास्तान है, तो मुझे अच्छा लगेगा अगर आप इस सफ़र का हिस्सा बनें।


अपनी राय साझा करें: क्या आप भी अक्सर खुद में सिमट जाते हैं? कमेंट्स में अपनी बात ज़रूर लिखें, आपकी हर एक टिप्पणी मेरे लिए बहुत मायने रखती है।


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आइए, खामोशियों के इस सफर को साथ मिलकर साझा करें।

टिप्पणियाँ

  1. Bilkul sahi likha aapne duniya ke log dusro ki kamiya dhundhte dhundhte apni kamiyo se rubaru nahi ho pa rahe hai par agar priy mittra dwara agar logo ko unki kamiya unhe dikhana chah rahe hai to hum aapke sath hai

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    उत्तर
    1. Ham aur aap kisi ke andar badlav nahi kar sakte par ha unki madad kar skte hai yah samjhne me ki wo bhi ishi samaaj aur duniya ka hissa hai wo alag nahi, achha laga apko vichar pasand aaye.

      हटाएं

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