बनारस ! एक अधूरी यात्रा, पर एक मुकम्मल अहसास!
"बनारस" एक अधूरी यात्रा, पर एक मुकम्मल अहसास! अ क्सर लोग कहते हैं कि बनारस एक शहर नहीं, एक 'अहसास' है। मैंने भी बहुत सुन रखा था। मेरे घर से दूर तो नहीं था, पर बनारस जाने का संयोग कभी बन ही न सका। कहते हैं न, जब बनारस बुलाता है, तभी आप जा पाते हैं। कुछ पारिवारिक कार्यक्रमों के चलते मुझे उस नगरी में जाने का मौका मिला। मेरा जाना बहुत जल्दबाजी भरा था। पूरा दिन निकल गया, पर सच कहूँ तो उस भागदौड़ में बनारस और मेरे बीच वो 'रूबरू' वाली मुलाकात नहीं हो पाई जिसे मैं वर्षों से ढूंढ रहा था। लेकिन, उन कुछ घंटों में जो मैंने देखा, वह एक खूबसूरत तस्वीर की तरह मेरी आँखों में बस गया। वह शांति, वह गंगा की लहरों का शोर, और वह बनारस का अपना अलग संसार... वह सब आज भी मेरे अंदर थमा हुआ है। मैंने उन्हीं पलों को शब्दों में पिरोने की कोशिश की है। यह कविता उन सभी के लिए है जिनके अंदर कहीं न कहीं बनारस ज़िंदा है, और जो इस भागती हुई दुनिया से दूर, एक बार फिर बनारस की उन गलियों में खुद को खोजना चाहते हैं। जब आप इसे पढ़ें, तो बस शब्दों को मत पढ़िएगा—कोशिश कीजिएगा कि आप खुद को उस घाट पर, उन ग...