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बनारस ! एक अधूरी यात्रा, पर एक मुकम्मल अहसास!

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  "बनारस" एक अधूरी यात्रा, पर एक मुकम्मल अहसास! अ क्सर लोग कहते हैं कि बनारस एक शहर नहीं, एक 'अहसास' है। मैंने भी बहुत सुन रखा था। मेरे घर से दूर तो नहीं था, पर बनारस जाने का संयोग कभी बन ही न सका। कहते हैं न, जब बनारस बुलाता है, तभी आप जा पाते हैं। कुछ पारिवारिक कार्यक्रमों के चलते मुझे उस नगरी में जाने का मौका मिला। मेरा जाना बहुत जल्दबाजी भरा था। पूरा दिन निकल गया, पर सच कहूँ तो उस भागदौड़ में बनारस और मेरे बीच वो 'रूबरू' वाली मुलाकात नहीं हो पाई जिसे मैं वर्षों से ढूंढ रहा था। लेकिन, उन कुछ घंटों में जो मैंने देखा, वह एक खूबसूरत तस्वीर की तरह मेरी आँखों में बस गया। वह शांति, वह गंगा की लहरों का शोर, और वह बनारस का अपना अलग संसार... वह सब आज भी मेरे अंदर थमा हुआ है। मैंने उन्हीं पलों को शब्दों में पिरोने की कोशिश की है। यह कविता उन सभी के लिए है जिनके अंदर कहीं न कहीं बनारस ज़िंदा है, और जो इस भागती हुई दुनिया से दूर, एक बार फिर बनारस की उन गलियों में खुद को खोजना चाहते हैं। जब आप इसे पढ़ें, तो बस शब्दों को मत पढ़िएगा—कोशिश कीजिएगा कि आप खुद को उस घाट पर, उन ग...

कभी खुद से मिलना हो तो कहना: अपनी खामोशियों को समझने का सफर

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  ​ कभी खुद से मिलना हो तो कहना: अपनी खामोशियों को समझने का सफ र मेरी नज़र से, क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपके भीतर शब्दों का सैलाब हो, लेकिन बाहर पूरी तरह सन्नाटा? हम अक्सर अपनी दुनिया में इतने सिमट जाते हैं कि अपनी ही खामोशियों के कैदी बन जाते हैं। मैंने हमेशा से जो महसूस किया, उसे अपने भीतर ही सहेजा। अपनों से साझा करने की कोशिश की, पर अक्सर अनुभव यही रहा कि लोग सुनने का नाटक तो करते हैं, लेकिन असल में कोई समझ नहीं पाता। ​यह ब्लॉग उन सभी के लिए है जो अकेलापन महसूस करते हैं, जो खुद को खोजने की तलाश में हैं और जो अंदर से बहुत कुछ हैं, पर बाहर से शांत हैं। यदि आप भी अपनी भावनाओं को बयां नहीं कर पाते, तो यह कविता आपकी ही कहानी है तुमको तुम ही से मिलाएँगे कभी ख़ुद से मिलना हो तो कहना, तुमको तुम ही से मिलाएँगे। घबराना मत, तुम्हारी कमियाँ नहीं गिनाएँगे, औरों ने क्या देखा तुममें, ये भी नहीं बताएँगे। जो कर सको यक़ीन, तो कहना, तुमको तुम ही से मिलाएँगे। जो औरों ने ना देखा, उस नज़र का दीदार कराएँगे। जो बिखर चुका है तुममें, वो बिखराव भी बताएँगे। कह ना सके जो अब तक किसी से... वो बात भी सुनाएँगे। ...

विकल्प! क्या आपके पास है?An Alternative! Do You Even Have One?

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  विकल्प! क्या आपके पास है? विकल्प क्या है? सवाल कर लो, नज़र उठाओ, बवाल कर लो। यहाँ तो मुर्दे भी समझ गए, कि अपनी हस्ती का क्या है करना। जिन्हें था जीते-जी तुमसे पर्दा, वो ढोंग रचते थे बनके अपने। सच तो यह है कि मरने के बाद, वो ढूँढते हैं वसीयत में हिस्से। जो चाहते हो मुझसे बचना, कहा था उनसे—"चढ़ाओ कंधा, लो आग के ही हवाले कर दो, या दो गज़ ज़मीन में दफ़न कर दो।" वो मुर्दा होकर भी समझ गए, तुम ज़िंदा रहकर भी कुछ समझ ना पाए। न अपनों में, न ग़ैरों में, यह तुम्हारी उलझन है, सुलझेगी तुम्हीं में। तो खुश रहिए, मस्त रहिए, यहाँ रहिए... चाहे इलाहाबाद रहिए! ........................ An Alternative! Do You Even Have One? An alternative? Go ahead, question, Raise your eyes, and cause a commotion. Even the dead here have understood by now, What exactly to do with their own existence. ​ Those who wore masks while you were alive, Staging a fake drama of being your own; The bitter truth is, the moment you die, They only hunt for what you left in your will. ​ If you are so desperate to be rid of me...

मरघट में कोई अमर नहीं”

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  “मरघट में कोई अमर नहीं” जीवन के अंतिम सत्य और समानता का सन्नाटा ! मरघट में कोई अमर नहीं, यहाँ किसी की हस्ती से कोई फ़र्क नहीं। तुम राजा हो या रंक, सब तौले जाओगे एक ही तराज़ू में, और अंतिम आहुति... उसी अग्नि में होगी! यह वह आख़िरी मुकाम है जहाँ हर ग़ुरूर घुटने टेक देता है, यहाँ का सन्नाटा हर बड़े नाम को मिट्टी में समेट लेता है। तुमने क्या कमाया, क्या लूटा? यहाँ सबका हिसाब लिया जाता है, इस श्मशान की राख में किसी का कोई मोल नहीं! चाहे सोने के सिंहासन पर बैठे हो, या फुटपाथ पर सोए हो, इस आग की लपटों में सब एक जैसे ही जलाए जाओगे। सांस की डोर टूटी तो वजूद महज़ मुट्ठी भर राख है, यहाँ आकर हर हस्ती की कहानी मुकम्मल... और सिर्फ़ खाक है! चीखती हैं ये जलती हुई लकड़ियाँ हर ज़िंदा इंसान को देखकर, कि सिकंदर भी गया था तो हाथ दोनों ख़ाली थे उसके; तुम लाख अकड़ लो साहब, पर मरघट में कोई अमर नहीं! No Mortal Endures in the Charnel Ground:  The Grand Equalizer In the charnel house, no mortal doth endure, Here, the vanity of stature findeth no cure. Whether thou art a monarch or a beggar in rags, Al...

इंसानियत का रिबूट

इंसानियत का रिबूट:  टेक मुगल्स और सामाजिक मसीहों का सच क्या आप भी उस भ्रम में जी रहे हैं कि आप अपनी मर्जी के मालिक हैं? अपने हाथ में पकड़िए इस डिजिटल गुलामी के यंत्र को—जिसे आप प्यार से 'स्मार्टफोन' कहते हैं। इसे 'स्मार्ट' आप नहीं, वे लोग बनाते हैं जो इसे चला रहे हैं। आप बस एक कच्चा माल हैं, जिसे ये टेक-सम्राट अपनी एल्गोरिदम की चक्की में पीस रहे हैं। आपका गुस्सा, आपकी लालसा, आपकी आस्था और आपका दुख—इनके लिए सब कुछ सिर्फ एक 'डेटा' है, एक ऐसा नंबर जिसे ये अपनी तिजोरियाँ भरने के लिए नीलाम कर देते हैं। आप जिसे 'नेटवर्क' कहते हैं, वह असल में एक 'शिकारगाह' है। और जो लोग खुद को समाज का 'मसीहा' कहकर धर्म, शिक्षा या न्याय की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वे इसी शिकारगाह के सबसे बड़े दलाल हैं। सामाजिक मसीहों का नग्न सच शिक्षा और चिकित्सा—जो सेवा का माध्यम थीं—आज मुनाफाखोरी की फैक्ट्रियां हैं। यहाँ भी दो चेहरे हैं। एक वे डॉक्टर और शिक्षक हैं जो मजबूर हैं, जो सिस्टम के दबाव में अपनी नजरें झुकाकर काम कर रहे हैं—उनकी आंखों में एक मूक शर्म है। लेकिन दूसरे वे हैं...

The Raw Sting: इंसान का कत्ल, डिजिटल जाल और सड़ी व्यवस्था

  डिजिटल गुलामी और अपाहिज व्यवस्था का सच: जब तकनीक और समाज ने मिलकर हमें कुचलना चाहा, तो मैंने लड़ना चुना! ​हम सब एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। हमें लगता है कि हम आज़ाद हैं। हमें लगता है कि इंटरनेट, सोशल मीडिया और यह जो नई-नई मशीनी बुद्धि आई है—जिन्हें लोग चैटजीपीटी, जेमिनी या मेटा कहते हैं—ये हमारी जिंदगी आसान बनाने आए हैं। ​लेकिन सच जानना चाहते हो? सच यह है कि हम इन बड़ी-बड़ी इंटरनेट कंपनियों के डिजिटल बंधुआ मजदूर बन चुके हैं। हम अपनी भावनाएं, अपनी कला, अपना कीमती वक्त और अपना खून-पसीना इन्हें सौंपते हैं, और बदले में ये हमारे वजूद को एक झटके में शून्य कर देते हैं। ​मैं The Raw Sting का रचनाकार हूँ। मेरा काम Unfiltered Raw Verses है, जहाँ मैं अपनी आत्मा को शब्दों में पिरोता हूँ और अपनी आवाज़ देता हूँ। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मेरे साथ जो हुआ, उसने इस चमक-दमक वाली दुनिया का सबसे बदसूरत चेहरा मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया। ​पहुँच का खेल या साज़िश? ​मैंने अपने खाते पर एक वीडियो अपलोड किया। कोई चोरी नहीं—पूरी तरह मेरी अपनी मेहनत। इंस्टाग्राम के सिस्टम ने मेरी पहुँच को पूरी ...

तुम मेरे मौन को समझ न सके! "🤫" | You Couldn't Understand My Silence!"

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तुम मेरे मौन को समझ न सके! जल्दबाज़ी और इस दिखावे के दौर में जहाँ रिश्ते चंद संदेशों, खोखले वादों और नुमाइश में सिमट कर रह गए हैं... वहाँ किसी एक का किसी के लिए बेइंतहा डूब जाना, एक गुनाह सा लगने लगता है। यह उस अंतहीन लाचारी की दास्तान है, जहाँ कोई अपना सब कुछ हारकर भी सिर्फ़ एक पुकार का इंतजार करता है, और बदले में उसे मिलती है तो सिर्फ़ एक गहरी खामोशी। नीचे दर्ज पंक्तियाँ सिर्फ़ शब्द नहीं हैं... यह आत्मसम्मान और बेबसी के बीच चलते एक मुकम्मल युद्ध की गवाही हैं। ठहर कर पढ़िएगा, क्योंकि इसमें हर उस दिल की धड़कन है जिसने कभी शिद्दत से किसी को चाहा है... तुम मेरे मौन को समझ न सके! दिल ने तो पहले ही आगाह किया था कि वो मेरा नहीं, मगर इस दीवानगी ने मजबूर कर दिया। इस रिश्ते की मुकम्मल पहचान मैं ही रहूँ ये लाज़मी तो नहीं, कभी एक वजूद तुम्हें भी मेरे लिए होना होगा। हर बार इन दूरियों को मिटाने मैं ही चल कर आऊँ ये मुमकिन नहीं, कभी कुछ कदम तुम्हें भी बढ़ाने होंगे। कभी अपनी ख़ामोशी तोड़कर तुम भी पुकारो मुझे, हर बार भला मैं ही अपने जज़्बात क्यों बयाँ करूँ? शिकवे तो इतने हैं इस दिल में कि बयाँ न हो सकें, पर ठहर...