The Raw Sting: इंसान का कत्ल, डिजिटल जाल और सड़ी व्यवस्था
डिजिटल गुलामी और अपाहिज व्यवस्था का सच: जब तकनीक और समाज ने मिलकर हमें कुचलना चाहा, तो मैंने लड़ना चुना!
हम सब एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। हमें लगता है कि हम आज़ाद हैं। हमें लगता है कि इंटरनेट, सोशल मीडिया और यह जो नई-नई मशीनी बुद्धि आई है—जिन्हें लोग चैटजीपीटी, जेमिनी या मेटा कहते हैं—ये हमारी जिंदगी आसान बनाने आए हैं।
लेकिन सच जानना चाहते हो? सच यह है कि हम इन बड़ी-बड़ी इंटरनेट कंपनियों के डिजिटल बंधुआ मजदूर बन चुके हैं। हम अपनी भावनाएं, अपनी कला, अपना कीमती वक्त और अपना खून-पसीना इन्हें सौंपते हैं, और बदले में ये हमारे वजूद को एक झटके में शून्य कर देते हैं।
मैं The Raw Sting का रचनाकार हूँ। मेरा काम Unfiltered Raw Verses है, जहाँ मैं अपनी आत्मा को शब्दों में पिरोता हूँ और अपनी आवाज़ देता हूँ। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मेरे साथ जो हुआ, उसने इस चमक-दमक वाली दुनिया का सबसे बदसूरत चेहरा मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया।
पहुँच का खेल या साज़िश?
मैंने अपने खाते पर एक वीडियो अपलोड किया। कोई चोरी नहीं—पूरी तरह मेरी अपनी मेहनत। इंस्टाग्राम के सिस्टम ने मेरी पहुँच को पूरी तरह रोक दिया। जहाँ लिखा होता है कि वीडियो कितने लोगों तक पहुँचा, वहाँ शून्य का निशान बना आया। लेकिन खेल यहाँ खत्म नहीं होता—अंदर के आँकड़े कहते हैं 'औसत देखने का समय: 9 सेकंड'।
अब कोई मुझे इस गणित का तर्क समझाए? अगर पहुँच शून्य है, तो यह 9 सेकंड कहाँ से आया? क्या फरिश्ते मेरा वीडियो देख रहे थे? नहीं! यह उनके सिस्टम की खराबी है। उनका अपना सर्वर वीडियो को खुद ही देख रहा था और जनता के सामने उसे शून्य पर बंद करके बैठा था। जब मैंने शिकायत की, तो शिकायत ही गायब हो गई। यानी आपकी आवाज़ दबाने का इंतज़ाम इनके सिस्टम में पहले से फिट है।
इन मशीनी सहायकों का असली खोखलापन
ये मशीनी बुद्धि वाले सिस्टम केवल एक नंबर के बेवकूफ हैं। ये गोल-गोल बातें घुमाएंगे, लेकिन समाधान के नाम पर शून्य। चाहे बैंक हो, सरकारी दफ़्तर हो या कोई प्राइवेट कंपनी—जहाँ भी ये मशीनें लगाई गई हैं, वे केवल दिखावे के डिब्बे हैं। ये केवल एक सजावटी सामान बनकर रह गई हैं। ये सुविधा नहीं, बल्कि एक जबरन थोपा गया बोझ हैं।
डिजिटल वेश्यावृत्ति और हमारी मानसिकता
आज जो लोग इन सोशल मीडिया मंचों पर कमाई की आस में रील्स बना रहे हैं, क्या आप उनकी मजबूरी जानते हैं? बहुत से लोग इस हद तक जा रहे हैं कि अपना स्वाभिमान, अपनी लाज, अपना शरीर और अपनी इज्जत तक दांव पर लगा रहे हैं। लोग कहते हैं, "कितना बेशर्म है!" पर हम यह जाने बिना उंगलियां उठा देते हैं कि शायद उस इंसान के पास घर चलाने का कोई और चारा ही न बचा हो। चाहे मध्यम वर्ग हो या कोई और, सब अपनी आजीविका के लिए इन संसाधनों के मोहताज हो गए हैं।
कुछ मजबूरी में कर रहे हैं, कुछ जानबूझकर, तो कुछ फैशन के नाम पर। लेकिन हम और आप—जो इन सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए अपनी उंगलियों को बस ऊपर स्क्रॉल करते हैं—क्या करते हैं? हम उस वीडियो को जूम करके देखते हैं, शरीर को ताकते हैं, और मजे लेते हैं। यह भूल जाते हैं कि हम भी उसी तकनीक से जुड़कर उसे देख रहे हैं। उस व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय, हम उस इंसान के मान-सम्मान पर उंगलियां उठाते हैं। हम उसे नीचा दिखाकर खुद को बड़ा समझने का भ्रम पालते हैं। यह हमारी और आपकी गिरती हुई सोच का ही सबूत है।
बड़े मालिकों का पाखंड
इन कंपनियों के मालिक हमें डराते हैं कि एआई के आने से तुम्हारा अस्तित्व खत्म हो जाएगा। अभी हाल ही में चैटजीपीटी के मालिक ने बयान दिया कि—"मैंने खुद अपनी ही बनाई प्रणाली का इस्तेमाल करना बंद कर दिया है।" यह क्या है? पहले ये लोगों के बीच नशा डालते हैं, और फिर खुद ही अपनी बात को गलत साबित कर देते हैं। यानी इनके पास अथाह पैसा है, तो ये आम आदमी की जिंदगी और उसकी रोजी-रोटी के साथ जैसे चाहे खेलेंगे?
लाखों-करोड़ों की तनख्वाह पाने वाला इंजीनियर अपनी आलीशान ज़िंदगी में मस्त है। उसे लगता है कि उसने जो कोडिंग लिख दी, वही सत्य है। कंपनी का मालिक खुद यह देखने नहीं आता कि उसके नाम पर क्या अत्याचार हो रहा है। वह बस अपनी अरबों की तिजोरी भरने में लगा है।
सिर्फ कंपनियां नहीं, पूरी व्यवस्था अपाहिज है
सच तो यह है कि लोग जिंदगी से नहीं हारते, लोग समाज में फैले उन झूठे आश्वासनों से हारते हैं जो उन्हें बर्बाद कर देते हैं। इसके लिए केवल टेक कंपनियां जिम्मेदार नहीं हैं। यह पूरी सरकार, वह कानून जो अपाहिज हो चुका है, और वह व्यवस्था जो समाज को चला रही है—सब के सब अपाहिज हैं।
चाहे मीडिया हो, शिक्षा हो या चिकित्सा—कुछ भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं है। सब केवल अपनी होड़ में हैं। जो जितना बड़ा है, वह खुद को उतना बलशाली मानकर अपने नीचे वालों को कुचलता जा रहा है। आप किसी छोटे से काम के लिए सरकारी दफ़्तर जाइए, या तो रिश्वत देनी पड़ेगी या महीनों चक्कर लगाने पड़ेंगे। न जाने कितने लोग कोर्ट के चक्कर लगाते-लगाते मर गए, उनकी पीढ़ियां खत्म हो गईं, लेकिन न्याय नहीं मिला।
यह आम आदमी की जंग है
मुझे उनके अमीर होने से दुख नहीं है। दुख इस बात का है कि उनकी नीतियां आम आदमी पर थोपी जा रही हैं। और आम आदमी? वह एक बेवकूफ की तरह "यह तो मेरा मामला नहीं है" कहकर इग्नोर कर देता है। वह भूल जाता है कि आज नहीं पड़ा, तो कल उसके परिवार के किसी सदस्य के जीवन में ज़रूर पड़ेगा।
आए दिन गरीबों के अकाउंट से मेहनत की कमाई गायब हो जाती है। रातों-रात किसी के खाते में अरबों आ जाते हैं। यह किसकी जिम्मेदारी है? परेशानी केवल आम आदमी को होती है, उन ऊँची गद्दियों पर बैठे अधिकारियों या पूँजीपतियों को नहीं।
जब इंसान जागेगा...
इंसान का वजूद खत्म करना इतना आसान नहीं है। न तो इसे बनाने वालों के बस की बात है और न ही उन कंपनियों के बूते की।
इंसान आज दबा हुआ हो सकता है, लेकिन हर वह पूँजीपति यह बात अपने दिमाग से निकाल दे कि यह इंसान कभी जागेगा नहीं। एक नहीं जागेगा, दो नहीं जागेगा, लाख नहीं जागेगा, लेकिन किसी ना किसी दिन जिस दिन यह पूरी जनता जागेगी, तब क्या होगा? यह धरती सीमित है, कहीं भागने का मौका नहीं मिलेगा। तब उन्हें जवाब देना पड़ेगा कि उन्होंने इंसानियत के साथ क्या किया।
मैंने हार मानने के बजाय लड़ना चुना है। मैंने कानूनी शिकायत दर्ज कराई है और उनके सिस्टम के इस धोखे को उनके मुंह पर दे मारा है। मेरी कला किसी कंपनी के कंप्यूटर की गुलाम नहीं है।
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इस ब्लॉग में व्यक्त किए गए विचार लेखक के समाज के प्रति निष्पक्ष अवलोकनों और विश्लेषण का परिणाम हैं। इसमें वर्णित कुछ डिजिटल घटनाएं और व्यवहार वे हैं जिन्हें लेखक ने एक जागरूक साक्षी के रूप में देखा है। इसका उद्देश्य किसी कंपनी या तकनीक की छवि खराब करना नहीं, बल्कि डिजिटल समाज के उस अंधेरे पक्ष को उजागर करना है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
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