सबके अपने राम हैं, सबके अपने सच ...अब तो आ जाओ राम — हे राम!
सबके अपने राम हैं, सबके अपने सच . ..अब तो आ जाओ राम — हे राम! — पृथ्वी (Prathvi) 🦂 क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी से बहुत तार्किक, सुलझी हुई और विषय-केंद्रित बात करने बैठें, और अचानक बातचीत का रुख ही बदल जाए? आप बात किसी विषय (Topic) की कर रहे हों, और सामने वाला व्यक्ति तर्क खत्म होते ही सीधे आप पर (Person) हमला करने लगे? आज के दौर में अगर आप थोड़ा भी ठहरकर सोचने और समझने वाले इंसान हैं, तो यह कड़वा अहसास आपके लिए नया नहीं होगा। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक, और दफ्तर की टेबल से लेकर घर के ड्राइंग रूम तक—एक अजीब सा बहरापन फैला हुआ है। हर इंसान चिल्ला रहा है, अपनी बात साबित करने में जुटा है, लेकिन सामने वाले को सुनने और समझने का सब्र किसी के पास नहीं है। आखिर हम किस सामाजिक और मानसिक मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहाँ हर कोई अपनी नज़र में 100% सच्चा है और बाकी पूरी दुनिया गलत? भाग १ सबके अपने राम सबके अपने राम हैं, सबके अपने सच। दूजे को झूठा मानें, खुद को मानें सच। अंतरमन को बंद किए सब, इसको ही मानें धर्म। अपने भीतर दीवारें ऊँची, बाहर खोजें कर्म। सबके अ...