विकल्प! क्या आपके पास है?An Alternative! Do You Even Have One?

 

जीवन में सही विकल्प चुनने पर प्रेरणादायक कविता और आध्यात्मिक विचार"

विकल्प! क्या आपके पास है?

विकल्प क्या है? सवाल कर लो,
नज़र उठाओ, बवाल कर लो।
यहाँ तो मुर्दे भी समझ गए,
कि अपनी हस्ती का क्या है करना।

जिन्हें था जीते-जी तुमसे पर्दा,
वो ढोंग रचते थे बनके अपने।
सच तो यह है कि मरने के बाद,
वो ढूँढते हैं वसीयत में हिस्से।

जो चाहते हो मुझसे बचना,
कहा था उनसे—"चढ़ाओ कंधा,
लो आग के ही हवाले कर दो,
या दो गज़ ज़मीन में दफ़न कर दो।"

वो मुर्दा होकर भी समझ गए,
तुम ज़िंदा रहकर भी कुछ समझ ना पाए।

न अपनों में, न ग़ैरों में,
यह तुम्हारी उलझन है, सुलझेगी तुम्हीं में।

तो खुश रहिए, मस्त रहिए,
यहाँ रहिए... चाहे इलाहाबाद रहिए!
........................

An Alternative! Do You Even Have One?

An alternative? Go ahead, question,

Raise your eyes, and cause a commotion.

Even the dead here have understood by now,

What exactly to do with their own existence.


Those who wore masks while you were alive,

Staging a fake drama of being your own;

The bitter truth is, the moment you die,

They only hunt for what you left in your will.


If you are so desperate to be rid of me,

I told them—"Give me your shoulder,

Hand me over to the raging flames,

Or bury me deep in two yards of earth."


Even in death, those corpses understood,

Yet you, while breathing, remain blind and the same.


Neither among your own, nor among strangers,

This tangled web is yours, and yours alone to unravel.


So stay happy, stay carefree,

Be here... or be in Allahabad!

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विकल्प? क्या आपके पास है विकल्प?

​होते हैं—विकल्प सबके पास होते हैं! बस देखने का नज़रिया सही होना चाहिए कि आप क्या देखते हैं और इस दुनिया में कहाँ तक देख पाते हैं। जो भी मौजूद है—इंसान, पेड़, पहाड़, जानवर, नदियां, समुद्र, धरती, आसमान... जिंदा या मुर्दा। सबके पास विकल्प होते हैं।

​क्या आपने सुना? 'मुर्दा'।

हां, सही सुना। मुर्दों के पास भी विकल्प होते हैं। वो भी कोई लाचार नहीं होता। फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता है कि आप उन विकल्पों को कैसे देखते हैं—खुली आंखों से या बंद आंखों से। जिसकी आंखें बंद हो चुकी हैं, जिसका शरीर बेजान हो चुका है... उसने तो अपना विकल्प ढूंढ लिया।

इंसान के जाने के बाद वो मुर्दा ही बन जाता है। और ये जो रोने वाले हैं ना... ये उसके लिए नहीं रोते। ना उसके प्यार में रोते हैं। क्योंकि हकीकत यह है कि जहां जीते-जी सम्मान और प्यार ना मिला, वहां मरने के बाद प्यार मिल सकता है? संभव ही नहीं है।

वो रोते हैं? नहीं! वो तो बस खुश होते हैं। वो मुँह से भले कुछ न बोलें, पर मन ही मन सोचते हैं कि कितनी जल्दी इसको यहाँ से हटाएँ। वो खुद जल्दी में रहते हैं, क्योंकि यह विकल्प मुर्दे का है! उसके अंदर की उस बदबू का है, उस सड़न का है। और यह इन जिंदा लोगों की लाचारी है, मजबूरी है जिससे वो बचते हैं।

लोग लाशों से डरते हैं साहब, क्योंकि लाशें झूठ नहीं बोलतीं। वो अपनी सड़न से ज़िंदा लोगों के पाखंड का नक़ाब खींच लेती हैं। मुर्दा अपनी बदबू से उन लोगों की नाक में दम कर देता है और चीख कर कहता है—


​"बचा सको तो बचा लो। मैं तो बदबू फैलाऊंगा। मैं सड़ूंगा। मैं मुर्दा हूं, और यह मेरा विकल्प है! चलो, जो बचना चाहते हो इस सड़न से, इस गंदगी से, तो दफनाओ मुझे, जलाओ मुझे। क्योंकि मुझे पता है तुम मेरी मौत पर शोक नहीं मना रहे, तुम मौन नहीं हो, मेरे लिए नहीं रो रहे... तुम बस दुनिया को दिखाने के लिए रो रहे हो।

चलो... उठाओ चार कंधों पर मुझे! ले चलो श्मशान, फूंक दो। कुछ लकड़ियां और आग के हवाले कर दो। या दफना दो मुझे उस मिट्टी के अंदर कई परतों में। मैं मुर्दा हूं, यह मेरा विकल्प है।

अब कर लो कुछ दिनों का इंतजार, फिर मनाओ जश्न! मैंने क्या छोड़ा, तुमने क्या पाया? अगर मैंने कुछ तुम्हारे काम का छोड़ा होगा तो कुछ दिन खुशियां मनाओगे, और जो कुछ ना मिले... तो मैं जानता हूं मुझे गालियां ही दोगे। क्योंकि मैं मुर्दा हूं।"

मैं तो मुर्दा हूं, मैंने अपना विकल्प ढूंढ लिया। क्या आप जिंदा होकर ढूंढ पाए?

​अगर मेरे पास विकल्प हैं, तो आपके पास भी हैं, क्योंकि आप जिंदा हैं। तो अपने मन-मस्तिष्क को सही दिशा में मोड़िए। अपनी खुली आंखों से अपने आसपास देखिए कि क्या हैं आपके विकल्प। और खुद से मत रोइए। कोई आंसू पोंछने नहीं आएगा।


यहाँ पर मुझे मुज़फ़्फ़र रज़्मी साहब का वो मशहूर शेर याद आ रहा है जो मेरे दिल के हमेशा से बहुत करीब रहा है—

जिसे मैं अपने शब्दों में बोलना पसंद करता हूं:

ना हम सफर से ना मुस्तफर से,

यह हमारे पैर का कांटा है,

निकलेगा हम ही से।


मुज़फ़्फ़र रज़्मी साहब का वास्तविक शेर:

(न हमसफ़र, न किसी हमनशीं से निकलेगा,

तुम्हारे पाँव का काँटा, तुम्हीं से निकलेगा।)


​🦂 बिच्छू का आखिरी डंक: भ्रम का अंत

​इस जीवन की कड़वाहट और सच को खुली आँखों से देखिए। किसी और के भरोसे बैठने से अच्छा है कि अपनी उलझनें खुद सुलझाई जाएँ। जब तक साँसें चल रही हैं, अपने सही विकल्पों को पहचानिए, क्योंकि वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता। खुद से लड़िए, खुद को बदलिए।

​अगर आपको मेरी कविता ने या मेरे भाव ने ज़रा सा भी सोचने पर मजबूर किया हो या एक नया दृष्टिकोण दिया हो, तो इसे उन लोगों तक पहुँचाइए जिन्हें इसकी सख़्त ज़रूरत है।

बिच्छू के डंक से निकले हुए शब्द,

पृथ्वी 🦂

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