मरघट में कोई अमर नहीं”

Poem 'Marghat Mein Koi Amar Nahin' by Prathvi, exploring the philosophy of life and mortality. Presented by Prithvi Musings and The Raw Sting."

 
“मरघट में कोई अमर नहीं”

जीवन के अंतिम सत्य और समानता का सन्नाटा !


मरघट में कोई अमर नहीं,

यहाँ किसी की हस्ती से कोई फ़र्क नहीं।

तुम राजा हो या रंक, सब तौले जाओगे एक ही तराज़ू में,

और अंतिम आहुति... उसी अग्नि में होगी!

यह वह आख़िरी मुकाम है जहाँ हर ग़ुरूर घुटने टेक देता है,

यहाँ का सन्नाटा हर बड़े नाम को मिट्टी में समेट लेता है।

तुमने क्या कमाया, क्या लूटा? यहाँ सबका हिसाब लिया जाता है,

इस श्मशान की राख में किसी का कोई मोल नहीं!

चाहे सोने के सिंहासन पर बैठे हो, या फुटपाथ पर सोए हो,

इस आग की लपटों में सब एक जैसे ही जलाए जाओगे।

सांस की डोर टूटी तो वजूद महज़ मुट्ठी भर राख है,

यहाँ आकर हर हस्ती की कहानी मुकम्मल... और सिर्फ़ खाक है!

चीखती हैं ये जलती हुई लकड़ियाँ हर ज़िंदा इंसान को देखकर,

कि सिकंदर भी गया था तो हाथ दोनों ख़ाली थे उसके;

तुम लाख अकड़ लो साहब, पर मरघट में कोई अमर नहीं!


No Mortal Endures in the Charnel Ground: 

The Grand Equalizer

In the charnel house, no mortal doth endure,

Here, the vanity of stature findeth no cure.

Whether thou art a monarch or a beggar in rags,

All shall be weighed upon the selfsame scales,

And the final offering… into the absolute flame shall pass!

This is the ultimate citadel where all pride must bend,

Where the profound silence doth every grand name comprehend,

Merging them back into the dust from whence they came.

What hast thou gathered, what hast thou plundered?

Here, the final ledger is laid bare,

In the ashes of this sepulcher, no earthly value doth fare!

Whether thou sat upon a throne of glittering gold,

Or slept upon the cobblestones, forsaken and cold,

In the furious tongues of this blaze, alike ye shall burn.

When the thread of breath doth snap, thy existence is but a fistful of dust,

Here, every mortal saga findeth its absolute close… and fadeth into rust!

These burning embers shriek as they behold the living,

Whispering that even Alexander the Great departed with hands empty and bare;

Boast as thou wilt, O proud man, but in the charnel house, no mortal endures!

यह कविता जीवन का कोई झूठा दिलासा नहीं देती, न ही यह मृत्यु को किसी खूबसूरत मखमली चादर में लपेटकर पेश करती है। यह सीधे उस क्रूर और नग्न सत्य पर प्रहार करती है जिसे इंसान रोज भूलने का नाटक करता है। मृत्यु और जीवन का संबंध कोई रहस्य नहीं है; यह एक सीधा हिसाब है जो श्मशान की जमीन पर आकर हर किसी को चुकता करना पड़ता है।

समय का तराजू और श्मशान की क्रूर समानता

इंसान ने अपनी सहूलियत के लिए दुनिया को अमीर-गरीब, ऊंच-नीच और जात-पात में बांट रखा है। लेकिन यह कविता साफ कहती है कि मरघट इन सारे इंसानी पैमानों को लात मार देता है। यहाँ प्रकृति का अपना एक क्रूर तराजू है। इस तराजू पर किसी का रसूख, किसी का पैसा या किसी का खानदान नहीं तौला जाता। जीवन का अंतिम सत्य यही है कि जिसने पूरी जिंदगी मखमली गद्दों और सोने के सिंहासनों पर राज किया, और जो पूरी जिंदगी सड़क के किनारे फुटपाथ की धूल में सोया—दोनों की लाशें एक ही जैसी लकड़ियों पर, एक ही जैसी आग की लपटों में झोंक दी जाती हैं। वह आग किसी का वीआईपी स्टेटस देखकर ठंडी नहीं होती। वह सबको एक ही रफ्तार से जलाकर राख करती है।

घमंड का कबाड़खाना और आखिरी हिसाब

इंसान का सारा घमंड, उसका सारा गुरूर इसी श्मशान की सीमा के बाहर दम तोड़ देता है। श्मशान का जो सन्नाटा है, वह कोई शांति नहीं है; वह इतिहास के हर बड़े और रसूखदार नाम पर मौत का एक तीखा तमाचा है। यहाँ आकर हर बड़ा नाम मिट्टी में मिल जाता है। जिंदगी भर इंसान जो 'मेरा-मे

रा' करता रहा, जो दौलत उसने जोड़ी या दूसरों से छीनी, उसका सारा हिसाब इसी जलती हुई जमीन पर आकर शून्य हो जाता है। जैसे ही गले से सांस की आखिरी डोर टूटती है, इंसान का पूरा वजूद, उसकी पूरी ताकत सिर्फ एक मुट्ठी मटमैली राख में बदल जाती है। इस राख के ढेर को देखकर दुनिया का कोई भी समझदार आदमी यह नहीं बता सकता कि इसमें राजा कौन सा था और भिखारी कौन सा। यहाँ आकर हर कहानी जबरन खत्म कर दी जाती है।

जलती लकड़ियों की चीख और सिकंदर का हश्र

कविता का अंत किसी भी जिंदा इंसान की रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए काफी है। श्मशान में जो लकड़ियाँ चरचराकर जल रही हैं, वे सिर्फ जल नहीं रही हैं, बल्कि वे वहाँ खड़े हर जिंदा और मगरूर इंसान को देखकर हंस रही हैं, चीख रही हैं। वे चीख-चीखकर इतिहास का सबसे बड़ा सच दोहरा रही हैं कि जब पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने वाला सिकंदर मरा था, तो उसके हाथ भी खाली थे। उसने मरते वक्त अपने हाथ कफ़न से बाहर इसलिए लटकवा दिए थे ताकि दुनिया का हर अकड़ने वाला इंसान देख सके कि सब कुछ जीतने के बाद भी वह मौत से एक सांस भी नहीं खरीद सका और खाली हाथ लाश बनकर गया।

इसलिए साहब, तुम लाख अकड़ लो, लाख पैसा जोड़ लो या ऊंचे पदों पर बैठ जाओ, सच यही है कि इस मरघट की मिट्टी में कोई वीआईपी नहीं होता। यहाँ कोई अमर नहीं है। सब खाक हैं।

इस श्मशान की आग और जलती चिताओं का यह सच किसी दूसरे के लिए नहीं है, यह तुम्हारे और हमारे आने वाले कल का सच है। जरा सोचिए, जिस शरीर, जिस पैसे और जिस रुतबे के घमंड में हम दूसरों को छोटा समझते हैं, दूसरों का दिल दुखाते हैं, वह सब कुछ एक

दिन इसी मिट्टी में राख की ढेरी बन जाना है। जब जाना खाली हाथ ही है, तो फिर इस चार दिन की जिंदगी में इतनी अकड़, इतना झूठ और इतना अहंकार क्यों?

आज जब आप इस ब्लॉग को पढ़कर उठें, तो अपने भीतर झांक कर जरूर पूछिएगा—क्या वाकई आपकी अकड़ का मौत के सामने कोई मोल है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें और यदि इस सच ने आपके दिल को छुआ हो, तो इसे अपने उन अपनों के साथ जरूर शेयर करें जो जिंदगी की इस अंधी दौड़ में व्यस्त हैं।


Prathvi🦂




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