आईने के उस पार

A digital artwork featuring a metallic blue scorpion resting on planet Earth viewed from space, with a bright sunrise and glowing horizon in the background, symbolizing Prathvi The Raw Sting


 ​"मुझको समझ पाना इतना मुश्किल तो नहीं,

   बस तुम्हें आईना होना होगा..."

​अक्सर लोग पूछते हैं कि मेरे नाम के साथ 'पृथ्वी' और 'बिच्छू' क्यों जुड़ा है? क्या यह कोई पहचान है या केवल एक दिखावा? सच तो यह है कि यह मेरे व्यक्तिगत अनुभव भी हैं और इस दौर का एक कड़वा सच। जब दुनिया लोगों की आर्थिक स्थिति देखकर उन्हें परखने लगती है, तो मुझे अहसास हुआ कि इंसान की कीमत उसके भीतर के भावों से नहीं, बल्कि उसकी जेब के शोर से तय होती है। उस अकेलेपन में, मैंने प्रकृति को आईने की तरह देखा और अपने अस्तित्व के तीन स्तंभों को पहचाना:

1.🌍 पृथ्वी: धैर्य की ऊर्जा

​"पुरानी मेज़ पर

जलती हुई मोमबत्ती,

और कलम से उतरे

कुछ शब्द गवाह हैं।"

मैंने देखा कि पृथ्वी ने पूरी दुनिया को थाम रखा है। वह अच्छे या बुरे का फर्क नहीं करती, चुपचाप सबको अपने अंदर समेटे रखती है। वह सहती है, धैर्य रखती है। यह वह शांत ऊर्जा है जो समाज की कड़वाहट को बिना प्रतिशोध के सहती है और सत्य को देख रही है।

2.🦂 बिच्छू: प्रतिरोध की ऊर्जा

​"मेरी जेब में बंद

चाबी और सिक्के

कभी बेवजह और

बेवक़्त शोर नहीं करते।"

लेकिन जब इस नकली दुनिया का दिखावा और उसकी कड़वाहट अति पर पहुँच जाती है, तो पृथ्वी का वह मौन टूट जाता है। तब भीतर का 'बिच्छू' जागता है। यह डंक किसी से नफरत नहीं करता, बल्कि यह केवल उस झूठ को भेदने का माध्यम है जो समाज ओढ़े हुए है। यह बेवजह शोर नहीं मचाता, बस अपनी बात को धार देकर सीधे दिल पर उतार देता है।

3.✨ उत्पत्ति: संतुलन की ऊर्जा

​"क्योंकि बिना किसी शोर के,

      यह लेखनी हर सीमा पर अपना

   संतुलन स्थापित कर देती है।"

जब इंसानों की गलतियाँ अति पार कर जाती हैं, तो यह पृथ्वी संकेत देती है। अगर लोग फिर भी न मानें, तो वह बिना किसी चेतावनी के सीधे तबाही मचाती है और अंत में फिर से एक गहरी शांति की स्थापना करती है। मेरी लेखनी भी यही है—बिना शोर के, समाज के झूठ को आईना दिखाकर संतुलन स्थापित करने वाली शक्ति।

​एक बार किसी ने सलाह दी— 'रोते क्यों हो? किसी से मांग लो।'

जवाब केवल इतना था:

​"उसने कहा—

“खुदा से मांग…”

मैंने नज़रें झुका कर कहा—

“मांगा था…

हर रोज़ दुआओं में।

मगर वो भी…

तुम जैसा ही निकला…!”"

यह कविता मेरी उस हताशा और समझ का आईना है, जहाँ उम्मीदें खत्म होती हैं और वास्तविकता शुरू होती है। 'पृथ्वी' का धैर्य, 'बिच्छू' का डंक और 'उत्पत्ति' का संतुलन—ये कोई नाम नहीं, बल्कि मेरी वे ऊर्जाएँ हैं जो मुझे इस दौर के शोर में स्थिर रखती हैं।

​अगर आप भी इस अकेलेपन, इस गहरे संतुलन और कड़वे सच को महसूस करते हैं, तो मेरी इस दुनिया में आपका स्वागत है।

टिप्पणियाँ

  1. आपने बहुत ही गहराई से अपने शब्दों को सरल भाषा में व्यक्त किया जिसे पढ़ने के बाद ऐसा लगता है जैसे यह मेरी ही कहानी हो

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    उत्तर
    1. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद|
      आपको पूरी पोस्ट में किस भाव में ज्यादा प्रभावित किया

      हटाएं

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