इंसानियत का रिबूट

इंसानियत का रिबूट: 

टेक मुगल्स और सामाजिक मसीहों का सच

क्या आप भी उस भ्रम में जी रहे हैं कि आप अपनी मर्जी के मालिक हैं?

अपने हाथ में पकड़िए इस डिजिटल गुलामी के यंत्र को—जिसे आप प्यार से 'स्मार्टफोन' कहते हैं। इसे 'स्मार्ट' आप नहीं, वे लोग बनाते हैं जो इसे चला रहे हैं। आप बस एक कच्चा माल हैं, जिसे ये टेक-सम्राट अपनी एल्गोरिदम की चक्की में पीस रहे हैं। आपका गुस्सा, आपकी लालसा, आपकी आस्था और आपका दुख—इनके लिए सब कुछ सिर्फ एक 'डेटा' है, एक ऐसा नंबर जिसे ये अपनी तिजोरियाँ भरने के लिए नीलाम कर देते हैं।

आप जिसे 'नेटवर्क' कहते हैं, वह असल में एक 'शिकारगाह' है। और जो लोग खुद को समाज का 'मसीहा' कहकर धर्म, शिक्षा या न्याय की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वे इसी शिकारगाह के सबसे बड़े दलाल हैं।

सामाजिक मसीहों का नग्न सच

शिक्षा और चिकित्सा—जो सेवा का माध्यम थीं—आज मुनाफाखोरी की फैक्ट्रियां हैं। यहाँ भी दो चेहरे हैं। एक वे डॉक्टर और शिक्षक हैं जो मजबूर हैं, जो सिस्टम के दबाव में अपनी नजरें झुकाकर काम कर रहे हैं—उनकी आंखों में एक मूक शर्म है। लेकिन दूसरे वे हैं जो जानबूझकर इस व्यवस्था का हिस्सा बने हैं, जो आंखें मिलाकर बिना किसी पछतावे के आम आदमी का शोषण कर रहे हैं। ये वही 'मसीहा' हैं जो न्याय और कानून को अपनी जेब में रखते हैं।

यही हाल धर्म का है। मंदिर के उन दृश्यों को देखिये जहाँ करोड़ों लोग घंटों धूप में अपनी आस्था का मोल चुका रहे हैं, वहीं एक पूंजीपति करोड़ों की भीड़ को चीरकर सबसे पहले दर्शन करने पहुँच जाता है। क्या भगवान के लिए भी अब 'वीआईपी' लाइन है? नहीं, यह आस्था नहीं, धर्म के ठेकेदारों का अहंकार है। धर्म का चोला पहने ये लोग आज धर्म का ही सबसे बड़ा अपमान कर रहे हैं। आज सच्चे धर्म का पालन करने वाले बहुत कम हैं; बाकी तो बस उस अंधी दौड़ का हिस्सा हैं जो धर्म के नाम पर इंसानों को लूट रहे हैं और धर्म के विरुद्ध वह सब कर रहे हैं जो इसकी नींव को खोखला करता है।

कुदरत का नियम: एक शाश्वत सत्य

हम इस भूल में हैं कि यह सिस्टम सर्वोपरि है। सच यह है कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, चाहे वह जमीन पर बैठे, आम की डाल पर, या किसी मखमल के सोफे पर—अंत सबका 'बैठने' में ही होता है। स्थान बदल सकता है, तरीका बदल सकता है, लेकिन कुदरत का अंतिम सच नहीं। हम सब उसी ऊर्जा के अंश हैं, जिसे ये लोग प्रतीकों में बांटकर हमें लड़ा रहे हैं।

दोषी कौन है?

इस पतन का सबसे बड़ा दोषी कौन है? वह 'सच्चा इंसान', जो सब देख रहा है, सब समझ रहा है, लेकिन अपनी चुप्पी से इन शोषकों को मजबूत कर रहा है। वह इंसान जो भीड़ का हिस्सा बनकर उस अंधी दौड़ में दौड़ रहा है, जो जानता है कि सामने वाला उसका शोषण कर रहा है पर आवाज नहीं उठाता। हमारी यही चुप्पी ही इन मसीहों का सबसे बड़ा सहारा है। हम इंसान को 'मोहरा' मानकर बेचने वाले उस हर व्यक्ति को अपनी चुप्पी से ताकत दे रहे हैं, चाहे वह गली का दुकानदार हो, स्कूल चलाने वाला हो या कोई बड़ा पूंजीपति।

इंसानियत का रिबूट कब होगा?

इतने शोर के बीच, वह इंसान कहाँ है जो अपने मूल्यों को बचाए हुए है? वह इस मशीनी शोर में ओझल हो गया है। इन 'टेक मुगल्स' और सामाजिक मसीहों ने हमें सब कुछ दिया, सिवाय हमारी इंसानियत के।

मैंने अपनी बात कह दी है। मैंने हार मानने से इनकार कर दिया है। यदि आप भी इस हकीकत से वाकिफ हैं, तो अपनी आवाज़ नीचे साझा कीजिए। जब तक हम सच बोलने से डरेंगे, ये ठेकेदार हम पर अपना अधिकार जमाते रहेंगे।

अस्वीकरण: ये विचार लेखक के समाज के प्रति निष्पक्ष अवलोकनों का परिणाम हैं। इसका उद्देश्य समाज के उस अंधेरे पक्ष को उजागर करना है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। 

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